नई दिल्ली: वैश्विक राजनीति और अंतरराष्ट्रीय व्यापार के मोर्चे पर इस वक्त एक बहुत बड़ा उलटफेर देखने को मिल रहा है। मिडिल ईस्ट में जारी भारी तनाव और जंग के हालातों के बीच, अमेरिका अब भारत को एलपीजी (LPG) और एलएनजी (LNG) की सप्लाई करने वाला सबसे बड़ा संकटमोचक बनकर उभरा है। मई 2026 के ताजा और चौंकाने वाले आंकड़ों के अनुसार, अमेरिका ने इतिहास में पहली बार पारंपरिक रूप से गैस सप्लाई करने वाले खाड़ी (Gulf) देशों को भी पीछे छोड़ दिया है।
होर्मुज स्ट्रेट ठप, भारत ने बदली रणनीति
वेस्ट एशिया में बढ़ते तनाव के चलते दुनिया का सबसे संवेदनशील समुद्री मार्ग ‘होर्मुज स्ट्रेट’ (Strait of Hormuz) इस समय जहाजों की आवाजाही के लिए लगभग ठप पड़ा है। गौरतलब है कि भारत अपनी कुल जरूरत का लगभग 60% एलएनजी और करीब-करीब पूरी एलपीजी का आयात इसी रास्ते से करता आया है। लेकिन फरवरी के आखिरी हफ्ते में शुरू हुए ईरान संकट के बाद से इस मार्ग से व्यापारिक जहाजों का गुजरना बंद हो गया, जिससे कतर, सऊदी अरब और यूएई से आने वाली सप्लाई में भारी गिरावट आई है।
सऊदी अरब से आयात 75% घटा, अमेरिका से रिकॉर्ड बढ़ोतरी
मई के महीने में सऊदी अरब से भारत होने वाले एलपीजी का आयात भारी-भरकम 75% तक घट गया है। लेकिन भारत ने इसका तोड़ निकालते हुए अमेरिका से आने वाली एलपीजी में 63% की जबरदस्त बढ़ोतरी दर्ज की। भारत ने अकेले मई में अमेरिका से 6.30 लाख टन एलपीजी खरीदी, जो सभी खाड़ी देशों की कुल सप्लाई से 60% ज्यादा है। वहीं अमेरिका से एलएनजी (LNG) की खेप भी तीन गुना बढ़कर 9 लाख टन के ऑल-टाइम रिकॉर्ड लेवल पर पहुंच गई है।
दूरदर्शिता आई काम, पहले ही की थी तैयारी
भारत सरकार ने आने वाले इस भीषण संकट का अंदाजा पहले ही लगा लिया था और अपनी बैकअप स्ट्रेटजी तैयार कर ली थी। यही वजह है कि देश की सरकारी तेल कंपनियों ने अमेरिकी सप्लायर्स के साथ साल 2026 के लिए पहले से ही 22 लाख टन एलपीजी आयात करने का एक मजबूत कॉन्ट्रैक्ट (Structured Contract) साइन कर लिया था। आज यह दूरदर्शी फैसला देश के बेहद काम आ रहा है।
बढ़ा आयात बिल, पर सुरक्षित हुई एनर्जी
कूटनीतिक जानकारों का कहना है कि अमेरिका से लंबी दूरी होने के कारण भारत को भारी-भरकम समुद्री भाड़ा चुकाना पड़ रहा है, जिससे देश का आयात बिल (Import Bill) काफी बढ़ गया है। हालांकि, देश की सुरक्षा और ऊर्जा जरूरतों के आगे सरकार के लिए यह अतिरिक्त रकम मायने नहीं रखती। अमेरिका से आने वाली यह गैस फिलहाल देश की कुल जरूरत के 40% से भी ज्यादा हिस्से को अकेले पूरा कर रही है।
इस रणनीतिक कदम से भारत ने न केवल देश में गैस की संभावित किल्लत को टाल दिया है, बल्कि वैश्विक मंच पर अपनी मजबूत और लचीली विदेश नीति का लोहा भी मनवाया है।
